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Wednesday, 20 March 2019

Van Vihar National Park

Van Vihar National Park is a national park central India. It is located in Bhopal near VIP road .


Van Vihar National Park
Van Vihar National Park

What is Mobile radiation


The animals are kept in their near natural habitat. Most of the animals are either orphaned brought from various parts of the state or those, which are exchanged from other zoos. No animal is deliberately captured from the forest.


Van Vihar National Park
Van Vihar National Park
Van Vihar National Park
Van Vihar National Park

 The capital city of Madhya Pradesh. Declared a national park in 1979, it covers an area of about 4.45 km2. Although it has the status of a national park, Van Vihar is developed and managed as a modern zoological park, following the guidelines of the Central Zoo Authority.

Van Vihar National Park
Van Vihar National Park

Van Vihar is unique because it allows easy access to the visitors through a road passing through the park, security of animals assured from poachers by building trenches and walls, chain-link fence and by providing natural habitat to the animals.
Van Vihar National Park
Vihar National Park snak

Van Vihar categorises animals in two categories, captive and herbivores. All carnivorous animals are kept inside enclosed areas and herbivores are allowed to roam freely.
Van Vihar National Park
Van Vihar National Park


Raisen fort bhopal

Free ranging animals, such as Cheetal, Sambhar, Blackbuck, Blue bull, Nilgai, Chausingha, Wild Boar, Porcupine, Hare, Rhesus Macaque, Red Monkey, Common Langur, etc. are unique features of Van Vihar. There are no enclosures for them except the outer boundaries of Van Vihar. Normally the grass and other plant species growing in Van Vihar are sufficient for these herbivores. However, in summer when the grass is scarce, green fodder produced in the fodder farm and wheat husk procured from the market is provided as a supplement. In its Aquatic Ponds, Star tortoises, turtles, and a variety of fish can be found. Van Vihar also preserves animals belonging to endangered species

Wednesday, 20 February 2019

sanchi stupa

भोपाल एवं विदिशा के बीचोंबीच स्थित छोटा सा सांची नगर सम्राट अशोक के युग के बौद्ध स्तूपों के लिए प्रसिद्ध है।

sanchi stupa
sanchi stupa


यहां पर वर्ष भर देश-विदेश से सैलानी आते रहते हैं। जिस समय बौद्ध धर्म का दबदबा था, उस समय सांची का वैभव भी अपने चरम पर था। भोपाल एवं विदिशा के बीचो बीच एक छोटी सी पहाड़ी पर

स्थित सांची स्तूप मौर्य सम्राट अशोक ने बनवाया था




उस दौर की निशानिया सांची में आज भी मौजूद है। उस
चरम के अवशेष के रूप में यहां बौद्ध विहार एवं स्तूपों को
आज भी देखा जा सकता है। सम्राट अशोक के शासन
में सांची बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का प्रमुख केंद्र था । २
पुरानी धरोहरों की उचित देखभाल और संरक्षण के कारण
ही सांची ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।
और देशी-विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है।
मध्यप्रदेश विदिशा के उत्तर-पश्चिम में करीब नौ किमी की
दूरी पर बसा सांची बीना और भोपाल जंक्शन के बीच में है।
स्तूप वन: यहां का बड़ा स्तूप नंबर एक पर । इस स्तुप को
विशाल पत्थरों से बना भारत का प्राचीनतम स्तूप भी कहा
जा सकता है। यह स्तूप प्राचीन वास्तुकला तथा शिल्प का
बेहतरीन नमूना है। इस स्तूप के भीतर एक और आधा स्तूप
है। इस स्तूप का व्यास करीब 36.60 मीटर है एवं ऊंचाई
लगभग 14.5 मीटर है। इस स्तूप के चारो ओर परिक्रमा
पथ बना है। पर्यटकों के लगातार चलने से यह अब चिकना
हो गया है। इस स्तूप के चारों ओर जो तोरण द्वार बने हुए

कुम्भ मेला क्यों मनाया जाता है
हैं, वह बहुत ही अद्भुत हैं। पत्थरों पर बौद्ध कथाओं का
अंकन दूसरे बौद्ध स्मारकों के मुकाबले में सांची में सबसे
बढ़िया माना जाता है। इस स्तूप के पूर्वी तथा पश्चिमी द्वारों
पर युवा गौतम बुद्ध की आध्यात्मिक यात्रा की अनेकों
कहानियां अंकित है।

तोरण द्वार विशाल स्तूप के चारों ओर से घेरे खड़े
तोरण द्वारों पर बौद्ध धर्म के सिद्धांतों के अनुसार बुध का
चित्रांकन प्रतीक शैली में किया गया है। वक्ष प्रतीक है उनके
बोधि ज्ञान का चक्र संकेत करता है उनके उपदेशों का पाद
चिन्ह और गद्दी उनके अस्तित्व को दर्शाते है। इन स्तपो के
शिलालेख पर उन तमाम लोगों के नाम अंकित है, जिन्होंने
वेदिका और भूतल निर्माण में सहयोग किया था।
स्तूप : यह पहाड़ी की तलहटी पर बना है। इसकी सबसे
बड़ी विशेषता बलुआ पत्थर का बना कटघरा है। वह उसे
चारों ओर से घेरे हुए है। इस स्तूप में कोई तोरण द्वार नही
है। इस पर उकेरे गए पशु-पक्षी, फूल-पत्ती, नाग, किन्नरों
और मानवो के भित्तिचित्र जीवंत दिखाई पड़ते हैं


ऊपर की छतरी चिकने पत्थर की बनी हुई है।

स्तूप : इस स्तूप के अंदर महात्मा बुद्ध के दो प्रिय शिष्यों के
अवशेष मिले है जिन्हें बाद में इंग्लैंड ले जाया गया जहां
अर्द्धगोलाकार गुम्बद पर बना चमत्कार पत्थर देखने योग्य है।
संग्रहालय प्राचीन भारतीय वास्तुकला और स्थापत्य कला
की संपूर्ण जानकारी के लिए वहां स्थित संग्रहालय देखने
योग्य है। भारतीय पुरातत्व के इस संग्रहालय में बुद्ध से
संबंधित सामग्री जमा की गयी है।

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अशोक स्तंभ



अब आप अशोक स्तंभ देखने जा
सकते हैं। इस बौद्ध स्तंभ का
निर्माण ईसा पूर्व तीसरी सदी में
हुआ था। यह बड़े स्तूप के दक्षिणी
द्वार के निकट स्थित है। पर्याप्त देखरेख के अभाव में आज
यह स्तंभ जीर्णशीर्ण अवस्था में है।

Thursday, 14 February 2019

valentine day meaning | वैलेंटाइन डे क्यों मनाया जाता है


कैसे  इसका नाम वेलेंटाइन डे

valentine day meaning | वैलेंटाइन डे क्यों मनाया जाता है
Love emage


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ऐसा माना जाता है कि 'वेलेंटाइन डे' का नाम संत वेलेंटाइन के नाम पर रखा गया है, 


लेकिन क्या आप जानते हैं।
कि प्यार करने वालों का स्पेशल दिन 'वेलेंटाइन-डे' का नाम संत वेलेंटाइन के नाम पर क्यों पड़ा? नहीं, तो आइए हम
आपको बताते हैं। दरअसल रोम में तीसरी सदी में क्लॉडियस नाम के राजा का राज हुआ करता था। क्लॉडियस का
मानना था कि विवाह करने से पुरुषों की शक्ति और बुद्धि खत्म हो जाती है। इसी के चलते उसने पूरे राज्य में यह
आदेश जारी कर दिया कि उसका कोई भी सैनिक या अधिकारी शादी नहीं करेगा, लेकिन संत वेलेंटाइन ने क्लॉडियस

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के इस आदेश पर कड़ा विरोध जताया और पूरे राज्य में लोगों को विवाह करने के लिए प्रेरित किया। संत वेलेंटाइन ने
अनेक सैनिकों और अधिकारियों का विवाह करवाया। अपने आदेश का विरोध देख आखिर क्लॉडियस ने 14 फरवरी
सन् 269 को संत वेलेंटाइन को फांसी पर चढ़वा दिया। तब से उनकी याद में यह दिन मनाया जाने लगा।

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'वेलेंटाइन डे' ऐसा दिन होता है, जिस दिन प्रेमी और प्रेमिका के बीच पल रहे प्यार को और नजदीकियां मिल जाती हैं।


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14 फरवरी को मनाए जाने वाले इस
दिन के विभिन्न देशों में अलग
अंदाज और विश्वास के साथ मनाया
जाता है। जहां चीन में यह दिन
‘नाइट्स ऑफ सेवेन्स' के नाम से
मनाया जाता है, वहीं जापान और
कोरिया में इस दिन
को वाइट

डे का नाम
से जाना जाता है. ।
इतना ही नहीं, इन देशों
में इस दिन से लेकर पूरे एक महीने
तक लोग अपने प्यार का इजहार करते हैं।
और एक-दूसरे को तोहफे एवं फूल देकर
अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं।
पश्चिमी देशों में पारंपरिक रूप से इसे
मनाने के लिए वेलेंटाइन-डे' के नाम से
कार्ड आदान-प्रदान तो किया ही जाता है,
साथ ही दिल, क्यूपिड, फूलों और ग्रीटिंग
कार्ड कैसे प्रेम के चिह्नों को उपहार स्वरूप
देकर अपनी भावनाओं का भी
इजहार किया जाता है।

न जिद है न कोई गुरूर है हमे,
बस तुम्हे पाने का सुरूर है हमे,
इश्क गुनाह है तो गलती की हमने,
सजा जो भी हो मंजूर है हमे।
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सोती हुई आँखों को सलाम हमारा
मीठे सुनहरें सपनों को आदाब हमारा,
दिल मे रहे प्यार का एहसास सदा ज़िंदा,
आज की रात का यही है पैग़ाम हमारा।
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Friday, 8 February 2019

raisen fort। रायसेन के किले का सच

रायसेन के किले का सच यह पर था पारस पत्थर

raisen fort।
raisen fort।


 1200 ईस्वी में निर्मित यह किला मध्यप्रदेश का एक प्रमुख आकर्षण है।पहाड़ी की चोटी पर इस किले के निर्माण के बाद रायसेन कोइसकी पहचान प्राप्त हुई। बलुआ पत्थर से बना0 हुआ यह किला प्राचीन वास्तुकला एवंगुणवत्ता का एक अद्भुत प्रमाण है, जो इतनी शताब्दियां बीत जाने पर भी शान से खड़ा

हुआ है। विशाल पत्थरों से बनी हुई दीवारें नौ दरवाजों से बाहर खुलती हैं और इनके ऊपर तेरह बुर्ज हैं। आश्चर्यजनक बात यह यह है कि किले में 40 कुओं के साथ जल प्रबंधन एवं संरक्षण का एक उत्तम तंत्र है।
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किले के आसपास के क्षेत्र में भी कई प्राचीन गुफाएं एवं भित्ति चित्र हैं जो हमारे देश के प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति के बारे में बतातेहैं। रायसेन जिला रेल एवं सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है।

भोपाल से रायसेन पहुंचने के लिए अनेक वाहन उपलब्ध हैं।



रायसेन किले के अंदर जो भवन हैं उनमें बादल महल, रोहिणी महल, इत्रदान महलऔर हवा महल प्रमुख हैं। ऊपर ही 12 वीं सदी के एक शिव मंदिर के होने की भी पुष्टि होती है जिसके पट वर्ष में एक बार महाशिवरात्रि के दिन खोले जाते हैं। लोहे के दरवाजे गिलं गेट में मन्नत मांगते हा रंगीन कपड़े या धागे को बांधने की परंपरा बन गई
है। कुछ लोग तो प्लास्टिक की पन्नियों को ही बांध जाते हैं। उसी पह्मड़ी से लगी हुई कई

किले में मौजूद पारस पत्थर की रखवाली करता है जिन्न

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कहा जाता है कि इस किले में पारस पत्थर है, जिसकी रखवाली जिन्न करते हैं।

पहाडी की चोटी पर बलुआ पत्थर से बना हुआ ये किलो प्राचीन वास्तुकला एवं गणवत्ता का एक अद्भुत प्रमाण है जो इतनी शताब्दियां बीत जाने पर भी शान से खड़ा हुआ है।

इसी किले में दुनिया का सबसे पुराना वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम है। इस किले पर शेरशाह सरी ने भी शासन किया था। कहा जाता है यहां के राजा के पास पारस पत्थर था, जिसे किसी भी चीज को छुत्लाभर देने से वह सोना हो जाती थी। कहा जाता है कि इसी पारस पत्थर के लिए कई युद्ध हुए यहां के राजा रायसेन ने हारने के बाद पारस पत्थर को कुएं में फेंक दिया वह कुआं आज भी स्थित है

ऐसा हुआ राजा के साथ फिर


राजा की मौत के बाद यह किला वीरान हो गया। इसके बावजूद उस पारस पत्थर का ढूंढने उस किले में बहुत से लोग गए। ऐसा भी कहा जाता है कि जो भी किले में पत्थर को ढूंढने जाता, उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता। इसके पीछे का कारण बताया गया कि क्योंकि उस पारस पत्थर की रखवाली जिन्न करते हैं। यही वजह है कि उसको ढूंढने के लिए जाने वाला हर इंसान मानसिक संतुलन खो देता है।
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Tuesday, 5 February 2019

kumbh mela ki jankari

कुम्भ मेला क्यों मनाया जाता है

kumbh mela ki jankari
kumbh mela ki jankari

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुंभ छठे और महाकुंभ बारहवें वर्ष लगता है। लेकिन प्रयाग में माघ मेला प्रत्येक वर्ष लगता है जिसमें एक माह तक कल्पवासी कड़ाके की ठंड में एक कठिन जिंदगी जी कर अपने कल्पवास को पूरा करते हैं।

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पौराणिक मान्यता :


पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के बाद प्राप्त हुए अमृत को लेकर देवताओं और राक्षसों में विवाद हुआ था। अगर राक्षस अमृत पीने में सफल हो जाते तो वह अमरत्व प्राप्त कर लेते। यही वजह थी कि देवता, राक्षसों को अमृत नहीं देना चाहते थे। जब देवता अमृत को लेकर आकाश मार्ग से जा रहे थे उसी समय चार जगहों पर अमृत छलक गया था। इन चार स्थानों प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में कुंभ का मेला लगता है।

ग्रहों की चाल पर निर्भर करता है कुंभ मेला :


कुंभ मेला कब और कहां लगेगा यह ग्रहों की चाल पर निर्भर करता है। दरअसल कुंभ मेले के आयोजन में बृहस्पति ग्रह की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि गोचर में जब बृहस्पति ग्रह वृश्चिक राशि में प्रवेश करता है, उस वर्ष प्रयाग में अर्ध कुंभ (वर्तमान में कुंभ मेले) का आयोजन किया जाता है।

बृहस्पति के वृश्चिक राशि में प्रवेश करने के बाद जब माघ का महीना आता है, तब गंगा और यमुना के तट पर मेले की शुरुआत होती है। माघ के महीने में मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या और बसंत पंचमी के अवसर पर सभी अखाड़े शाही स्नान करते हैं। अमावस्या को कुंभ दिवस भी कहा जाता है। अमावस्या के दिन करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु गंगा और संगम में स्नान करते हैं।

मकर संक्रांति :


कुंभ की शुरुआत मकर संक्रांति के दिन पहले स्नान से होगी। इसे शाही स्नान और राजयोगी स्नान के नाम से भी जानते हैं। इस दिन संगम, प्रयागराज पर विभिन्न अखाड़ों के संत की पहली शोभा यात्रा निकलती है फिर शाही स्नान का आयोजन होता है। मकर संक्रांति पर सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश होता है। इस दिन स्नान के बाद सूर्य को जल देकर चावल और तिल को स्पर्श कर उसे दान में दिया जाता है। इस दिन उड़द दाल की खिचड़ी या दही-चूड़ा खाना जरूरी होता है।

पौष पूर्णिमा :


पौष पूर्णिमा 21 जनवरी को है और इस दिन कुंभ में दूसरा बड़ा आयोजन होगा। पौष पूर्णिमा के दिन से ही माघ महीने की शुरुआत होती है। कहा जाता है आज के दिन स्नान ध्यान के बाद दान पुण्य करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन से सभी शुभ कार्यों की शुरुआत होती है। वहीं, इस दिन संगम पर सुबह स्नान के बाद कुंभ की अनौपचारिक शुरुआत हो जाती है। इस दिन से कल्पवास आरंभ हो जाता है।

पौष एकादशी :

पौष एकादशी को कुंभ में तीसरे बड़े शाही स्नान का आयोजन होगा। 31 जनवरी को स्नान के बाद दान पुण्य किया जाता है।

मौनी अमावस्या :

कुंभ मेले में चौथा शाही स्नान मौनी अमावस्या यानि 4 फरवरी को होगा। इसी दिन कुंभ के पहले तीर्थाकर ऋषभ देव ने अपनी लंबी तपस्या का मौन व्रत तोड़ा था और संगम के पवित्र जल में स्नान किया था। इसलिए मौनी अमावस्या के दिन कुंभ मेले में बहुत बड़ा मेला लगता है, जिसमें लाखों की संख्या में भीड़ उमड़ती है।

बसंत पंचमी :

10 फरवरी को बसंत पंचमी यानि माघ महीने की पंचमी तिथि को मनाई जाएगी। बसंत पंचमी के दिन से ही बसंत ऋतु शुरू हो जाती है। कड़कड़ाती ठंड के सुस्त मौसम के बाद बसंत पंचमी से ही प्रकृति की छटा देखते ही बनती है। वहीं, हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस दिन देवी सरस्वती का जन्म हुआ था। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है।

माघी पूर्णिमा :

19 फरवरी को छठा शाही स्नान, माघ पूर्णिमा को होगा। माघ पूर्णिमा पर किए गए दान-धर्म और स्नान का विशेष महत्व होता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि माघ पूर्णिमा पर खुद भगवान विष्णु गंगा जल में निवास करते हैं। माघ मास स्वयं भगवान विष्णु का स्वरूप बताया गया है। पूरे महीने स्नान-दान नहीं करने की स्थिति में केवल माघ पूर्णिमा के दिन तीर्थ में स्नान किया जाए तो संपूर्ण माघ मास के स्नान का पूर्ण फल मिलता है।

कुंभ का वीडियो देखने के लिये यहाँ किल्क करे 


माघ एकादशी :

16 फरवरी को सातवां शाही स्नान, माघी एकादशी को होगा। इसदिन का पुराणों में बहुत महत्व है। इस दिन दान देना कई पापों को क्षम्य बना देता है।

महाशिवरात्रि :

कुंभ मेले का आखिरी शाही स्नान 4 मार्च को महा शिवरात्रि के दिन होगा। इस दिन सभी कल्पवासी अंतिम स्नान कर अपने घरों को लौट जाते हैं। भगवान शिव और माता पार्वती के इस पावन पर्व पर कुंभ में आए सभी भक्त संगम में डुबकी जरूर लगाते हैं। मान्यता है कि इस पर्व का देवलोक में भी इंतजार रहता है।

अगर नहीं जा सकते प्रयागराज तो करें ये कार्य

प्रयागे माघ पर्यंत त्रिवेणी संगमे शुभे।
निवास: पुण्यशीलानां कल्पवासो हि कश्यते॥ (पद्मपुरण)

कुंभ में सभी लोग नहीं जा पाते हैं, लेकिन जाने का सोचते जरूर हैं। यह समय दान, जप, ध्यान और संयम का समय रहता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कुंभ में जाए बगैर ही कैसे पुण्य लाभ कमाया जा सकता है? कुंभ में इस वक्त कल्पवास चल रहा है। कुंभ में जहां स्नान करने का महत्व है वहीं कल्पवास में नियम-धर्म का पालन करने का महत्व है। दूसरी ओर कुंभ में प्रवचन सुन कर, दान करके और पितरों के लिए तर्पण करके लोग पुण्य लाभ कमाते हैं। अगर आप चाहें तो अपने स्थान पर भी ये सब कुछ करके पुण्य लाभ कमा सकते हैं…

प्रतिदिन हल्दी मिले बेसन से स्नान करने के पश्चात सुबह-शाम संध्यावंदन करते समय भगवान विष्णु का ध्यान करें और निम्न मंत्र-क्रिया से स्वयं को पवित्र करें।

संध्यावंदन का मंत्र

ऊँ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा।
य: स्मरेत पुण्डरीकांक्ष से बाह्याभ्यंतर: शुचि।

इस मंत्र से आचमन करें

ऊँ केशवायनम: ऊँ माधवाय नम: ऊँ नाराणाय नम: का जाप करें।

हाथ में नारियल, पुष्प व द्रव्य लेकर यह मंत्र पढ़ें। इसके बाद आचमन करते हुए गणेश, गंगा, यमुना, सरस्वती, त्रिवेणी, माधव, वेणीमाधव और अक्षयवट की स्तुति करें।

जब तक कुंभ चल रहा हैं तब तक प्रतिदिन एक वक्त का सादा भोजन करें और मौन रहें। आप किसी योग्य व्यक्ति को दान दे सकते हैं। दान में अन्नदान, वस्त्रदान, तुलादान, फलदान, तिल या तेलदान कर सकते हैं। गाय, कुत्ते, पक्षी, कौए, चींटी और मछली को भोजन खिलाएं। गाय को खिलाने से घर की पीड़ा दूर होगी। कुत्ते को खिलाने से दुश्मन आपसे दूर रहेंगे।

कौए को खिलाने से आपके पितृ प्रसन्न रहेंगे। पक्षी को खिलाने से व्यापार-नौकरी में लाभ होगा। चींटी को खिलाने से कर्ज समाप्त होगा और मछली को खिलाने से समृद्धि बढ़ेगी। आप संकल्प लें कि किसी किसी भी तरह के नशे का सेवन नहीं करेंगे। क्रोध और द्वेष वश कोई कार्य नहीं करेंगे, बुरी संगत और कुवचनों का त्याग करेंगे और सदा माता-पिता व गुरु की सेवा करेंगे।

Sunday, 3 February 2019

chanakya niti hindi



आचार्य चाणक्य एक महान विभूति थे. मौर्य साम्राज्य अपने अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने चन्द्र गुप्त मोर्य को गद्दी पर बैठाया था , जिन्होंने अपनी विद्वत्ता, बुद्धिमता और क्षमता के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्‍यात हुए।


Chanakya niti
Chanakya niti 




पड़े :- भारतीय इतिहास की पुरानी तस्वरें
इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत ‍और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्‍ययन, चिंतन और जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्‍देश्य से अभिव्यक्त किया।

"चाणक्य, नीति" आचार्य चाणक्य की नीतियों का अद्भुत संग्रह है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना वह दो हजार चार सौ साल पहले था, जब इसे लिखा गया था ।



1chanakya niti hindi

आपने कई लोगो को देखा होगा जो आपके साथ बैठे रहते है. आपसे बाते करते है. आपने अपनी कोई महत्वपूर्ण बार रखी और वह उसे गौर से सुनने के बजाय अनदेखा करे तो समझ ले की यह


2. मूर्ख छात्रों को पढ़ाने तथा दुष्ट स्त्री के पालन पोषण से और दुखियों के साथ संबंध रखने से, बुद्धिमान व्यक्ति भी दुःखी होता है। तात्पर्य यह कि मूर्ख शिष्य को कभी भी उपदेश नहीं देना चाहिए, पतित आचरण करने वाली स्त्री की संगति करना तथा दुःखी मनुष्यो के साथ समागम करने से विद्वान तथा भले व्यक्ति को दुःख ही उठाना पड़ता है। - चाणक्य नीति

3.  बुरे मित्र पर अपने मित्र पर भी विश्वास नही करना चाहिए क्योंकि कभी नाराज होने पर सम्भवतः आपका विशिष्ट मित्र भी आपके सारे रहस्यों को प्रकट कर सकता है। - चाणक्य नीति

पड़े :- खजुराहो मंदिर की अदभुत तस्वीर

4. दुष्ट स्त्री, छल करने वाला मित्र, पलटकर कर तीखा जवाब देने वाला नौकर तथा जिस घर में सांप रहता हो, उस घर में निवास करने वाले गृहस्वामी की मौत में संशय न करे। वह निश्चित मृत्यु को प्राप्त होता है। - चाणक्य नीति


5. विपत्ति के समय काम आने वाले धन की रक्षा करे। धन से स्त्री की रक्षा करे और अपनी रक्षा धन और स्त्री से सदा करें। - चाणक्य नीति


6. आपत्ति से बचने के लिए धन की रक्षा करे क्योंकि पता नहीं कब आपदा आ जाए। लक्ष्मी तो चंचल है। संचय किया गया धन कभी भी नष्ट हो सकता है। - चाणक्य नीति

7. जहां धनी, वैदिक ब्राह्मण, राजा,नदी और वैद्य, ये पांच न हों, वहां एक दिन भी नहीं रहना चाहियें। भावार्थ यह कि जिस जगह पर इन पांचो का अभाव हो, वहां मनुष्य को एक दिन भी नहीं ठहरना चाहिए। - चाणक्य नीति

8. नौकरों को बाहर भेजने पर, भाई-बंधुओ को संकट के समय तथा दोस्त को विपत्ति में और अपनी स्त्री को धन के नष्ट हो जाने पर परखना चाहिए, अर्थात उनकी परीक्षा करनी चाहिए। - चाणक्य नीति

9. बीमारी में, विपत्तिकाल में,अकाल के समय, दुश्मनो से दुःख पाने या आक्रमण होने पर, राजदरबार में और श्मशान-भूमि में जो साथ रहता है, वही सच्चा भाई अथवा बंधु है। - चाणक्य नीति

10. जो अपने निश्चित कर्मों अथवा वास्तु का त्याग करके, अनिश्चित की चिंता करता है, उसका अनिश्चित लक्ष्य तो नष्ट होता ही है, निश्चित भी नष्ट हो जाता है। - चाणक्य नीति
11. लम्बे नाख़ून वाले हिंसक पशुओं, नदियों, बड़े-बड़े सींग वाले पशुओ, शस्त्रधारियों, स्त्रियों और राज परिवारो का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। - चाणक्य नीति

12. विष से अमृत, अशुद्ध स्थान से सोना, नीच कुल वाले से विद्या और दुष्ट स्वभाव वाले कुल की गुनी स्त्री को ग्रहण करना अनुचित नहीं है। - चाणक्य नीति

13. झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, छल-कपट, मूर्खता, अत्यधिक लालच करना, अशुद्धता और दयाहीनता, ये सभी प्रकार के दोष स्त्रियों में स्वाभाविक रूप से मिलते है।  - चाणक्य नीति

14.  जो मित्र प्रत्यक्ष रूप से मधुर वचन बोलता हो और पीठ पीछे अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से आपके सारे कार्यो में रोड़ा अटकाता हो, ऐसे मित्र को उस घड़े के समान त्याग देना चाहिए जिसके भीतर विष भरा हो और ऊपर मुंह के पास दूध भरा हो। - चाणक्य नीति


15 . मन से विचारे गए कार्य को कभी किसी से नहीं कहना चाहिए, अपितु उसे मंत्र की तरह रक्षित करके अपने (सोचे हुए) कार्य को करते रहना चाहिए। - चाणक्य नीति

16. हर एक पर्वत में मणि नहीं होती और हर एक हाथी में मुक्तामणि नहीं होती। साधु लोग सभी जगह नहीं मिलते और हर एक वन में चंदन के वृक्ष नहीं होते। - चाणक्य नीति

17. बुद्धिमान लोगो का कर्तव्य होता है की वे अपनी संतान को अच्छे कार्य-व्यापार में लगाएं क्योंकि नीति के जानकार व सद्व्यवहार वाले व्यक्ति ही कुल में सम्मानित होते है। - चाणक्य नीति

18 अत्यधिक लाड़-प्यार से पुत्र और शिष्य गुणहीन हो जाते है और ताड़ना से गुनी हो जाते है। भाव यही है कि शिष्य और पुत्र को यदि ताड़ना का भय रहेगा तो वे गलत मार्ग पर नहीं जायेंगे। - चाणक्य नीति

19: एक श्लोक, आधा श्लोक, श्लोक का एक चरण, उसका आधा अथवा एक अक्षर ही सही या आधा अक्षर प्रतिदिन पढ़ना चाहिए। - चाणक्य नीति

20: स्त्री का वियोग, अपने लोगो से अनाचार, कर्ज का बंधन, दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रता और अपने प्रतिकूल सभा, ये सभी अग्नि न होते हुए भी शरीर को दग्ध कर देते है। - चाणक्य नीति

21  बुरा आचरण अर्थात दुराचारी के साथ रहने से, पाप दॄष्टि रखने वाले का साथ करने से तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले से मित्रता करने वाला शीघ्र नष्ट हो जाता है। - चाणक्य नीति

22. मित्रता बराबर वालों में शोभा पाती है,नौकरी राजा की अच्छी होती है, व्यवहार में कुशल व्यापारी और घर में सुंदर स्त्री शोभा पाती है। - चाणक्य नीति

Friday, 1 February 2019

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आपने शायद प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग के बारे में सुना होगा। ऑक्सफोर्ड, इंग्लैंड में जन्मे और एक मोटर न्यूरॉन बीमारी से प्रभावित, स्टीफन हॉकिंग आधुनिक समय के सबसे प्रशंसित सैद्धांतिक चिकित्सकों में से एक थे। विज्ञान (विशेषकर कॉस्मोलॉजी) के क्षेत्र में उनके योगदान के अलावा, उनके जीवन में और भी बहुत सी बातें जानने लायक हैं। यहां उनके और विज्ञान में उनके उल्लेखनीय योगदान के बारे में कुछ रोचक तथ्य दिए गए हैं।

उनका जन्मदिन (8 जनवरी, 1942) खगोलविद और भौतिक विज्ञानी गैलीलियो गैलीली की मृत्यु की 300 वीं वर्षगांठ के दिन था।अपने स्कूल के समय के दौरान, स्टीफन हॉकिंग का नाम था- आइंस्टीन।
सेंट एल्बंस हाई स्कूल में, उन्होंने अपने दोस्तों के समूह के साथ एक कंप्यूटर और एक पुराने टेलीफोन स्विचबोर्ड, घड़ी के पुर्ज़ों और अन्य पुनर्नवीनीकरण घटकों से।
स्टीफन अपनी युवावस्था में बहुत साहसी और मजाकिया थे और यूनिवर्सिटी कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में रोइंग टीम का हिस्सा थे।
जब वह कैम्ब्रिज में अपनी पीएचडी कर रहे थे, तो उन्हे जेन वाइल्ड से प्यार हो गया जो उसकी बहन का दोस्त थी।

1963 में 21 वर्ष की आयु में, स्टीफन को एक मोटर न्यूरॉन बीमारी Amyotrophic Lateral Sclerosis (ALS) का पता चला, और डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि उनके पास जीने के लिए केवल 2 साल हैं।

एक परिवार के प्रवक्ता के मुताबिक, 14 मार्च 2018 की सुबह अपने घर कैंब्रिज में 'हॉकिंग की मृत्यु हो गई थी। उनके परिवार ने उनके दुःख व्यक्त करने वाले एक बयान जारी किया था।


Tuesday, 29 January 2019

sai baba ke chamatkar ki kahani


सांईं बाबा के बारे में तो हम सब ने सुना है वो हर धर्म को मानते थे और हर धर्म उनको मानता है आपके सामने प्रस्तुत उनकी कुछ महान कहानियां

Sai Baba of Shirdi
Sai Baba of Shirdi

पहली कहानी


सांईं बाबा प्रतिदिन मस्जिद में दीया जलाते थे। इसके लिए वे बनियों से तेल मांगने जाते थे। लेकिन एक दिन बनियों ने बाबा से कह दिया कि बाबा हमारे पास तेल नहीं है। तब बाबा वहां से चुपचाप चले गए और मस्जिद जाकर उन्होंने दीये में तेल की जगह पानी डाला और दीया जल पड़ा और यह बात चारों तरफ फैल गई। तब वहां के बनिये उनके सामने आए और उनसे मांफी मांगी तो बाबा ने उन्हें माफ कर दिया और उनसे कहा कि ‘अब कभी झूठ मत बोलना।’

दूसरी कहानी


एक बार बाबा का भक्त बहुत दूर से अपनी पत्नी को लेकर बाबा के दर्शन के लिए आया और जब वह जाने लगा तो जोरों से बारिश होने लगी। तब उनका भक्त परेशान होने लगा तब बाबा ने उनकी परेशानी को देखकर कहा, हे अल्लाह! बारिश को रोक दो, मेरे बच्चों को घर जाना है और तत्काल ही बारिश रुक गई।

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तीसरी कहानी


एक बार गांव के एक व्यक्ति की एक बेटी अचानक खेलते हुए वहां के कुएं में गिर गई। लोगों को लगा कि वह डूब रही है। सब वहां दौड़कर गए और देखा कि वह हवा में लटकी हुई है और कोई अदृश्य शक्ति उसे पकड़े हुए है। वे और कोई नहीं बाबा ही थे, क्योंकि वह बच्ची कहती थी कि मैं बाबा की बहन हूं। अब लोगों को कोई और स्पष्टीकरण की जरूरत नहीं थी।

चौथी कहानी


म्हालसापति के यहां जब पुत्र हुआ तो वे उसे बाबा के पास लेकर आए और उसका नामकरण करने के लिए कहने लगे। बाबा ने उस पुत्र को देखकर म्हालसापति से कहा कि इसके साथ अधिक आसक्ति मत रखो। सिर्फ 25 वर्ष तक ही इसका ध्यान रखो, इतना ही बहुत है। ये बात म्हालसापति को तब समझ आई, जब उनके पुत्र का 25 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। 1922 में भगत म्हालसापति का देहांत हो गया।

पांचवीं कहानी


एक दिन बाबा ने 3 दिन के लिए अपने शरीर को छोड़ने से पहले म्हालसापति से कहा कि यदि मैं 3 दिन में वापस लौटूं नहीं तो मेरे शरीर को अमुक जगह पर दफना देना। 3 दिन तक तुम्हें मेरे शरीर की रक्षा करना होगी। धीरे-धीरे बाबा की सांस बंद हो गई और शरीर की हलचल भी बंद हो गई। सभी लोगों में खबर फैल गई कि बाबा का देहांत हो गया है। डॉक्टर ने भी जांच करके मान लिया कि बाबा शांत हो गए हैं।

लेकिन म्हालसापति ने सभी को बाबा से दूर रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि 3 दिन तक इनके शरीर की रक्षा की जिम्मेदारी मेरी है। गांव में इसको लेकर विवाद हो गया लेकिन म्हालसापति ने बाबा के सिर को अपनी गोद में रखकर 3 दिन तक जागरण किया। किसी को बाबा के पावन शरीर को हाथ भी नहीं लगाने दिया। 3 दिन बाद जब बाबा ने वापस शरीर धारण किया, तो जैसे चमत्कार हो गया। चारों ओर हर्ष व्याप्त हो गया।

छठी कहानी


मुंबई के रहने वाले काका महाजनी का विचार शिर्डी में एक सप्ताह ठहरने का था। पहले दिन दर्शन करने के बाद बाबा ने उनसे पूछा, ‘तुम कब वापस जाओगे?’ उन्हें बाबा के इस प्रश्न पर आश्चर्य-सा हुआ। तब उन्होंने कहा, ‘जब आप आज्ञा दें तब।’ बाबा ने कहा, ‘कल ही।’ यह सुनकर काका महाजनी ने तुरंत शिर्डी से प्रस्थान कर लिया। जब वे मुंबई अपने ऑफिस में पहुंचे तो उन्होंने अपने सेठ को अतिउत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करते पाया, क्योंकि मुनीम के अचानक ही अस्वस्थ हो जाने के कारण काका की उपस्थिति अनिवार्य हो गई थी। सेठ ने काका को बुलाने के लिए पत्र लिखा था, जो उनके पते पर वापस लौट आया।

सातवीं कहानी


बाबा का जब हाथ जल गया था, तो भागोजी शिंदे ही उनके हाथ पर घी मलने और पट्टी लगाने का कार्य करते थे। भागोजी शिंदे कुष्ठ रोगी थे। चांदोरकरजी बाबा के लिए मुंबई से एक डॉक्टर परमानंद को इलाज के लिए लेकर आए थे लेकिन बाबा ने इंकार कर दिया और वे शिंदे के हाथों घी लगाकर ही ठीक हो गए।

आठवीं कहानी


धुमाल एक मुकदमे के संबंध में निफाड़ के न्यायालय को जा रहे थे। मार्ग में वे शिर्डी उतरे। उन्होंने बाबा के दर्शन किए और तत्काल ही निफाड़ को प्रस्थान करने लगे, परंतु बाबा की स्वीकृति प्राप्त न हुई। उन्होंने उन्हें शिर्डी में 1 सप्ताह और रोक लिया। इसी बीच में निफाड़ के न्यायाधीश उदरपीड़ा से ग्रस्त हो गए। इस कारण उनका मुकदमा किसी अगले दिन के लिए बढ़ाया गया। 1 सप्ताह बाद भाऊसाहेब को लौटने की अनुमति मिली। इस मामले की सुनवाई कई महीनों तक और 4 न्यायाधीशों के पास हुई। फलस्वरूप धुमाल ने मुकदमे में सफलता प्राप्त की और उनका मुवक्किल मामले में बरी हो गया।

नौवीं कहानी


नासिक के प्रसिद्ध ज्योतिष, वेदज्ञ, 6 शास्त्रों सहित सामुद्रिक शास्त्र में भी पारंगत मुले शास्त्री एक बार नागपुर के धनपति सांईं भक्त बापूसाहेब बूटी के साथ शिर्डी पधारे। हस्तरेखा विशारद होने के नाते मुले शास्त्री ने बाबा के हाथ की परीक्षा करने की प्रार्थना की, परंतु बाबा ने उनकी प्रार्थना पर कोई ध्यान न देकर उन्हें 4 केले दिए और इसके बाद सब लोग वाड़े को लौट आए। वाड़े से लौटने के बाद में आरती के समय बापूसाहेब से बाबा ने कहा कि वो मुले से कुछ दक्षिणा ले आओ। मुले जब दक्षिणा देने के लिए गए तो वे मस्जिद के बाहर ही खड़े रहकर बाबा पर पुष्प फेंकने लगे। लेकिन जब उन्होंने ध्यान से देखा तो उन्हें बाबा की जगह उनके कैलासवासी गुरु घोलप स्वामी दिखाई देने लगे। वे उनकी स्तु‍ति करने लगे और जब आंख खोली तो उन्हें बाबा को दक्षिणा मांगते हुए देखा। ये चमत्कार देखकर उनका संशय दूर हो गया।

दसवीं कहानी


एक डॉक्टर अपने सांईंभक्त मित्र के साथ शिर्डी पधारे। उन्होंने मित्र से कहा कि तुम ही दर्शन करने जाओ, मैं नहीं जाऊंगा, क्योंकि मैं श्रीराम के अलावा किसी के समक्ष नहीं झुकता। खासकर किसी यवन के समक्ष और वह भी मस्जिद में तो कतई नहीं। मित्र के कहा कि तुम्हें वहां कोई झुकने या नमन करने को कोई बाध्य नहीं करेगा। अत: मेरे साथ चलो, आनंद रहेगा। वे शिर्डी पहुंचे और बाबा के दर्शन को गए। परंतु डॉक्टर को ही सबसे आगे जाते देख और बाबा की प्रथम चरण वंदना करते देख सबको बड़ा विस्मय हुआ। लोगों ने डॉक्टर से पूछा कि क्या हुआ? डॉक्टर ने बतलाया कि बाबा के स्थान पर उन्हें अपने प्रिय ईष्टदेव श्रीराम के दर्शन हुए और इसलिए उन्होंने नमस्कार किया। जब वे ऐसा कह ही रहे थे, तभी उन्हें सांईंबाबा का रूप पुन: दिखने लगा। यह देख वे आश्चर्यचकित होकर बोले कि ‘क्या यह स्वप्न है? ये यवन कैसे हो सकते हैं? अरे! अरे! ये तो पूर्ण योग-अवतार हैं।’ बाद में वे डॉक्टर वहीं रुके और उन्होंने परम अनुभूति का अनुभव किया।

Thursday, 24 January 2019

वास्तु पुरुष कोन है


वास्तु पुरुष की कहानी

Vastu shastra

वास्तु शास्त्र में वास्तु पुरुष की एक कथा है। देवताओं और असुरों का युद्ध हो रहा था। इस युद्ध में असुरों की ओर से अंधकासुर और देवताओं की ओर से भगवान शिव युद्ध कर रहे थे। युद्ध में दोनों के पसीने की कुछ बूंदें जब भूमि पर गिरी तो एक अत्यंत बलशाली और विराट पुरुष की उत्पत्ति हुई। उस विराट पुरुष से देवता और असुर दोनों ही भयभीत हो गए। देवताओं को लगा कि यह असुरों की ओर से कोई पुरुष है। जबकि असुरों को लगा कि यह देवताओं की तरफ से कोई नया देवता प्रकट हो गया है। इस विस्मय के कारण युद्ध थम गया और अंत में दोनों उस विराट पुरुष को लेकर ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने उस पुरुष को अपने मानसिक पुत्र की संज्ञा दी और उनसे कहा कि इसका नाम वास्तु पुरुष होगा। वास्तु पुरुष वहाँ पर एक विशेष मुद्रा में शयन के लिए लेट गए और उनके कुछ हिस्सों पर देवताओं ने तथा कुछ हिस्सों पर असुरों ने अपना वास कर लिया। ब्रह्मा जी ने यह भी आदेश दिया कि जो कोई भी भवन, नगर, तालाब, मंदिर आदि का निर्माण करते समय वास्तु पुरुष को ध्यान में रख कर काम नहीं करेगा तो असुर लोग उसका भक्षण कर लेंगे। जो व्यक्ति वास्तु पुरुष का ध्यान रख कर कार्य करेगा, देवता उसके कार्य में सहायक होंगे। इस प्रकार वास्तु पुरुष की रचना हुई।

क्या है वास्तु पुरुष

देव शब्द का मूल अर्थ है ‘स्वयं में प्रकाशमान’। कोई भी ऐसी शक्ति जो किसी कार्य विशेष को करने में सहायक है, उसे देवmahavastu vastu purush  कहा जाता है। देव तत्व क्या है? आप अपना या दूसरों का जीवन सुखी बनाने के लिए कुछ करने की मन से चाहत रखने लगे। यही रचनात्मक ऊर्जा है देव तत्त्व। परन्तु तभी अचानक एक द्वंद्व (कॉनफ्लिक्ट) आया कि यह कैसे हो सकता है? यह तो ऐसा हो ही नहीं सकता। अगर ऐसा हो गया तो हमें नुकसान हो जाएगा, आदि। यही डर और अज्ञान असुर तत्त्व है।

भगवान शिव और अंधकासुर का युद्ध महज प्रतीकात्मक है। वे पसीने की बूंदें इस युद्ध का संपूर्ण प्रयास (टोटल एफर्ट) हैं। उससे जिस व्यवस्था का निर्माण हुआ, वह वास्तु पुरुष है। ब्रह्मा जी ने स्पेस के एक हिस्से को, जहाँ संपूर्ण व्यवस्था का निर्माण हुआ, उस व्यवस्थित आकाश को अपने मानस पुत्र की संज्ञा दी। भवन का निर्माण होते ही संपूर्ण जगत को रचने वाली शक्तियाँ उस भवन में आ जातीं हैं। उसका अपना एक स्वरूप है, जिसे हम वास्तु पुरुष का नाम देते हैं।

वास्तु पुरुष का प्रभाव

यहां पर ब्रह्मांडीय मन (ब्रह्मा जी) ने आगे कहा कि जो व्यक्ति घर, तालाब, जलाशय, मंदिर, नगर व्यवस्था में इसका ध्यान नहीं करेगा, उसका असुर भक्षण करेगा। ध्यान का अर्थ है यदि उस व्यवस्था को समझते हुए आप कार्य नहीं करेंगे तो असुरों का भोजन बनेंगे। असुरों का भोजन होने का अर्थ है कि वहां पर जो नकारात्मक शक्तियां हैं, वे आपके भीतर भी क्रियाशील हो जाएंगी। वहां पर डर लगेगा, द्वंद्व आएगा, दुविधा आएगी और कार्य को करने के मार्ग में जो भी नकारात्मक प्रभाव है, वह जागृत हो जाएगा

Wednesday, 23 January 2019

वो कीड़ा जिसकी वजह से हज़ारों लोगों ने पत्तागोभी खानी छोड़ दी

वो कीड़ा जिसकी वजह से हज़ारों लोगों ने पत्तागोभी खानी छोड़ दी


Tep warm

वो कीड़ा जिसकी वजह से हज़ारों लोगों ने पत्तागोभी खानी छोड़ दी

आपने भी सुना होगा, पत्ता गोभी में कीड़ा होता है और वो दिमाग में घुस जाता है. इसी डर से हजारों या उससे भी ज्यादा लोग पत्ता गोभी खाना छोड़ चुके हैं. वो कीड़ा क्या है और दिमाग में कैसे घुस जाता है, जानते हैं शुरुआत से पत्ता गोभी को इंग्लिश में CABBAGE और फूल गोभी को cauliflower कहते हैं. लेकिन पत्ता गोभी और फूल गोभी एक ही प्रजाती की सब्जी से बनी हैं. पत्ता गोभी में निकलने वाले कीड़े को टेपवर्म (tapeworm) यानी फीताकृमि कहा जाता है.
कीड़ा टेपवर्म आंतों में जाने के बाद ब्लड फ्लो के साथ शरीर के अन्य हिस्सों और मस्तिष्क में पहुंच सकता है. ये बहुत छोटा होता है. हमें नग्न आंखों से दिखाई नहीं देता. ये सब्जी उबालने और अच्छी तरह पकाने से मर सकता है. ये कीड़ा जानवरों के मल में पाया जाता है.
टेपवर्म बारिश के पानी या और किसी वजह से जमीन में पहुंचता है और कच्ची सब्जियों के जरिए फिर हमतक पहुंचता है. पेट में पहुंचने के बाद ये कीड़ा सबसे पहले आंतो, फिर ब्लड फ्लो के साथ नसों के जरिए दिमाग तक पहुंचता है. इसका लार्वा दिमाग को गंभीर चोट देता है.
टेपवर्म से होने वाला इन्फेक्शन टैनिएसिस (taeniasis) कहलाता है. शरीर में जाने के बाद, ये कीड़ा अंडे देता है. जिससे शरीर के अंदर जख्म बनने लगते हैं. इस कीड़ें की तीन प्रजातियां (1) टीनिया सेगीनाटा, (2) टीनिया सोलिअम और (3) टीनिया एशियाटिका होती हैं. ये लीवर में पहुंचकर ये सिस्ट बनाता है, जिससे पस पड़ जाती है. ये आंख में भी आ सकता है
ये कीड़े हमारे पेट के आहार को ही अपना भोजन बनाते हैं. जिस व्यक्ति के दिमाग में पहुंचते हैं उसे दौरे पड़ने लगते हैं. शुरुआत में इसके कोई लक्षण नहीं दिखाई देते. लेकिन सिर दर्द, थकान, विटामिन्स की कमी होना जैसे लक्षण दिखाई देते है. दिमाग में अंडों का प्रेशर इस कद्र बढ़ता है कि दिमाग काम करना बंद कर देता है.कहा जाता है कि दिमाग में कोई बाहरी चीज आ जाए तो उससे दिमाग का अंदरूनी संतुलन बिगड़ जाता है. एक टेपवर्म की लंबाई 3.5 से 25 मीटर तक हो सकती है. इसकी उम्र 30 साल तक होती है. इस कीड़े के इलाज के तौर पर वे दवाएं दी जाती हैं, जिससे ये मर जाए. या फिर सर्जरी भी की जा सकती है.कीड़े से बचने के लिए डॉक्टर्स का कहना है कि जिन चीज़ों में ये कीड़ा पाया जाता है, वे अधपकी खाने से टेपवर्म पेट में पहुंचते हैं. भारत में टेपवर्म का संक्रमण सामान्य है. यहां करीब 12 लाख लोग न्यूरोसिस्टिसेरसोसिस से पीड़ित हैं, ये मिर्गी के दौरों की खास वजहों में से एक है.इस कीड़े की 5 हजार से ज्यादा प्रजातियां बताई जाती हैं. भारत में टेपवर्म से होने वाली परेशानी 20-25 साल पहले सामने आई. तब देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग सिर में तेज दर्द की शिकायत के साथ हॉस्पिटल पहुंचे और उन्हें मिर्गी की तरह दौरे पड़ रहे थेअब बहुत सी जगहों पर पत्ता गोभी की जगह बजाय लेट्यूस लीव्स इस्तेमाल की जाती है. इस कीड़े का लार्वा पालक, मछली, पोर्क या बीफ में भी पाया जाता है. इन चीज़ों को भी अच्छी तरह पकाकर खाना चाहिए. एशियाई देशों की तुलना में यूरोपीय देशों में इसका खतरा काफी कम देखा जाता है.